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नटनागर का परिचय

राजा राजसिंह की रानी राजकुंवर चावड़ीजी की कोख से लदूना के राजमहलों में महाराजकुमार रतनसिंह का जन्म सोमवार, वैशाख बदी 1 सं0 1865 वि0 (11 अप्रेल, 1808 ई0) के दिन हुआ । रतनसिंह का बचपन लदूना के राजप्रासादों में व्यतीत हुआ । रतनसिंह की बाल्यकाल की अधिक बातें तो ज्ञात नहीं हैं। परन्तु यह बात प्रसिद्ध है कि विद्या अध्ययन के साथ ही जीवन का बहुत कुछ समय व्यायाम और आखेट में ही बीता । नियमित व्यायाम के कारण रतनसिंह का शरीर सुगठित और बलशाली बन गया था । शारीरिक बल के कई किस्से आज भी प्रसिद्ध हैं ।


राजा राजसिंह के योग्य निर्देशन में रतनसिंह ने उर्दू, फारसी, हिन्दी, ब्रज, संस्कृत और डिंगल भाषा का अध्ययन किया । अपने पिता व गुरु श्रूपदास से प्रेरणा प्राप्त कर रतनसिंह ”नटनागर“ उपनाम से हिन्दी, ब्रज, डिंगल, फारसी व उर्दू भाषाओं में कविता करने लगे । वि0सं0 1913 में ‘नटनागर विनोद’ की रचना की गई । रतनसिंह ने अपनी इस काव्य रचना में श्रृंगार के दोनों पक्षों संयोग और वियोग का सुन्दर चित्रण किया है । साथ ही अलंकार सौन्दर्य व भाषा माधुर्य भी देखने को मिलता है । नटनागर विनोद में अधिकतर ब्रजभाषा का उपयोग किया गया है । फिर भी कहीं-कहीं पर मालवा की प्रान्तीय भाषा की झलक भी दिखाई पड़ती है । इस रचना के साथ ही रतनसिंह ने उर्दू में एक ”दीवाने उश्शाक“ की रचना की थी, जिसकी संस्थान में अप्रकाशित प्रति है।


साहित्य प्रेम के साथ ही रतनसिंह को चित्रकला और संगीत का भी शौक था । रतनसिंह को घुड़सवारी का भी शौक था । घोड़ों के लक्षणों व गुणों पर ”अश्व विचार“ की भी रचना की थी।


महाराजकुमार रतनसिंह दादूपंथी सन्त श्रूपदास से बहुत प्रभावित थे और उनको अपना गुरु मानते थे । वह संस्कृत के बहुत अच्छे विद्वान थे । श्रूपदास और रतनसिंह के मध्य हुआ पत्र व्यवहार नटनागर विनोद में देखा जा सकता है । यह पत्र व्यवहार कविता में ही होता था । उसका संग्रह भी श्री नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ में संग्रहीत है । रतनसिंह कविता प्रेम व कविता लेखन से कवि जगत में काफी प्रसिद्ध थे । उनकी साहित्यिक गोष्ठी में सूर्यमल्ल, चण्डीदान, हरीराम, गुरु भाई शिवराम, श्याम राव आदि कवि सम्मिलित थे । कविता करने के साथ ही रतनसिंह को काव्य ग्रंथों को संग्रहीत करने का भी शौक था । इसके लिए कई काव्य ग्रंथों की प्रतिलिपियाँ करवाकर उनको संग्रहीत किया था । सीतामऊ की शासन व्यवस्था भी उन्ही के सुपुर्द थी । सीतामऊ राज्य के टांका संबंधी प्रकरणों को सुलझाने के लिए रतनसिंह ने ई0 सन् 1860 में ग्वालियर की यात्रा की। अंग्रेज अधिकारी ए.जी.जी. सेक्सपियर के माध्यम से ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव से मुलाकात कर अपनी वाकपटुता से प्रसन्न कर टांके की राशि में 5000/- रुपये की छूट प्राप्त करने में सफल रहे थे । ग्वालियर से वापस लौटते हुए रतनसिंह ने गंगा स्नान किया व ब्रजभूमि की यात्रा भी की थी ।


महाराजकुमार रतनसिंह की मृत्यु अपने पिता के जीवनकाल में ही 55 वर्ष की आयु में घोड़े से गिरने के कारण मंगलवार, माघ वदी 3 सं0 1920 (26 जनवरी, 1864 ई0) की मध्यरात्रि को हो गई थी।